Maa Aur Main | Pankaj Jeena | Podcast 17 | Radio City | Story | Mumma

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Jan 06
2023
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Did You Know?

Your brain loves stories in short bursts.

Research shows people remember information better when it is visual, emotional, and concise. So if this video taught you one useful thing in under 3 minutes, it already did its job.

कुछ लोगों का कहना है मई के दूसरे इतवार को mothers डे मनाया जाता है,हमारे जैसे लड़के जो गांव-देहात में पले-बढ़े होते हैं वो अपने माँ-पिता को अपना प्यार दिखा नहीं पाते है, उनके सामने हो नही पाता, आज के बच्चे "लव यू मॉम, ummah" ये सब आसानी से बोल लेते हैं, पर हम सभी से ये सब नही हो पाता। इसे शर्म-झिझक कह लें या फिर हमे वैसा माहौल ही न मिला; ये कह लें। माँ ने भी कभी हमसे कभी बाबू शोना करके बात न की, इसके विपरीत बहुत मार खाई है, बहुत मारा है हमे. ऐसा कुछ नहीं था घर में जो उठाने लायक हो और उसने मुझपर फेंककर ना मारा हो। चप्पल, झाड़ू, करछुल, छोलनी, किचन का हर समान फेंक कर मारा है मुझे बस चाकू को छोड़कर। ऐसा नही है सिर्फ मैं ही मार खाया हूँ, मोस्टली बच्चे हमारे आस-पड़ोस के सबकी हालत यही थी। पर आज लिख रहा हूँ, दुनिया को समझ रहा हूँ, दो रुपये कमा रहा हूँ, सब उसी का परिणाम है। कभी पढा नही तो मारा, याद नही किया टास्क तो मारा, रट कर टास्क याद किया तो और मारा, किसी को गलती से भी गाली दे दी तो दोगुना मारा, वीकली टेस्ट में 80% से कम लाया तो तिगुना मारा पर कभी मुझे हारने ना दिया, टॉप 3 से नीचे वर्ग में कभी आने ना दिया मुझे। चाहे कृष्ण का उपदेश हो या श्री राम की कथा, सब समझाया मुझे। घर मे ही सब पढ़ाया, सबकुछ सीखाया। बच्चे के कम नम्बर आ जाए तो आजकल मां कुछ बोलती नही उल्टा यह कहती है कि कोई बात नही अगली बार और मेहनत करना। सब ठीक है। बस इस डर से की कहीं बच्चे डिप्रेशन में ना चला जाए। पर हमलोग का अलग सीन था। नम्बर कम आया तो दे झाड़ू दे झाड़ू। और डिप्रेशन तो मम्मी की झाड़ू देखकर दो कोस दूर से ही भाग जाया करता था। 5 साल घर से बाहर रहा, पर कभी कुछ माँगा नहीं. खुद ही ट्यूशन पढा कर अपना खर्च निकाला. इकलौता था, चाहता तो अपनी ज़िद से सबकुछ मनवा सकता था। पर उचित-अनुचित का बोध तो मां ने किशोरावस्था में ही आत्मा तक में डाल दिया था। दूर रहकर बस एक ही चीज़ चाहिए होती है..कि दिन में एक बार "हाँ खाना खा लिया, अब सोने जा रहा हूँ" बस इतनी सी ही बात हो जाये। बहुत बार गलती की है मैंने, हर्ट भी किया हूँ मम्मी को। किसी का गुस्सा किसी पर, आज तक कभी माफी नही मांगा, जानता हूँ आवश्यकता नही, वो पहले ही माफ कर देती है हमेशा। लोग कहते हैं सिर्फ लड़कियां ही विदा होती है, ऐसी बात नही है लड़के भी विदा होते हैं। मैं भी विदा हुआ था, लड़कियों को कम से कम एक परिवार तो मिलता है, हम लड़कों को अकेले ही दर-ब-दर भटकना पड़ता हैं और पूरा जीवन भटकना पड़ता है। अनेक लड़के जो 15-16 की आयु में घर से निकल जाते हैं पढाई करने फिर पढाई पूरी करके किसी कम्पनी में कार्यरत हो जाते हैं फिर वो दुनिया के रेस में खुद को धकेल देते हैं और वो चाहकर भी फिर माँ के साथ पूरे साल में 10 दिन भी नही बीता पाते ढंग से। जब 15 वर्ष की आयु में वो लड़के घर छोड़ते हैं तब उन लड़को को ये कहां मालूम होता है कि अब साल भर में बस 2-4 बार ही माँ से छोटी-छोटी मुलाकातें हो पाएंगी। लड़कियों की विदाई के बाद जब मन वो मायके आकर 2-4 महीने रह लेती है। पर हम लड़के ना 2-4 महीने गुजार सकते हैं और ना ही हम लड़के विदाई पे रो सकते हैं, वो क्या है कि हमारी विदाई ऑफिसियल नही है न! जब एक बेटा अपनी माँ से कोसों दूर होता है और इस तेज़ रफ्तार वाली दुनिया के रेस में अपनी ज़िन्दगी को झोंक चुका होता है तब उसे अपना बचपन याद आता है और वो सोचता है कि क्या कभी वो दिन लौटेंगे जब हम और हमारी माँ साथ होंगे, आलू के पराठें उनके हाथ से, कुछ प्यार भरी बातें, 4 पराठें अपनी भूख के और एक जबरदस्ती उनके ज़िद के। #Maa रजनीकांत

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